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पद्मश्री पंडवानी लोक गायिका डॉ. तीजन बाई का व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर राष्ट्रीय आभासी संगोष्ठी

छत्तीसगढ़ कौशल न्युज  रायपुर:- विश्व हिंदी साहित्य सेवा संस्थान, प्रयागराज की छत्तीसगढ़ इकाई द्वारा पद्मश्री पंडवानी लोक गायिका डॉ. तीजन बाई...


छत्तीसगढ़ कौशल न्युज 

रायपुर:- विश्व हिंदी साहित्य सेवा संस्थान, प्रयागराज की छत्तीसगढ़ इकाई द्वारा पद्मश्री पंडवानी लोक गायिका डॉ. तीजन बाई को श्रद्धांजलि स्वरूप “पद्मश्री पंडवानी लोक गायिका डॉ. तीजन बाई का व्यक्तित्व एवं कृतित्व” विषय पर राष्ट्रीय आभासी संगोष्ठी का आयोजन किया गया। संगोष्ठी में साहित्यकारों, शिक्षाविदों एवं कला प्रेमियों ने डॉ. तीजन बाई के व्यक्तित्व, कृतित्व और छत्तीसगढ़ की लोककला को विश्व पटल पर स्थापित करने में उनके योगदान को याद किया।कार्यक्रम की अध्यक्षता विश्व हिंदी साहित्य सेवा संस्थान, प्रयागराज की डॉ. विजयलक्ष्मी रामटेके ने की। उन्होंने कहा कि भारतीय लोककला में तीजन बाई का नाम अत्यंत सम्मान के साथ लिया जाता है। उन्होंने छत्तीसगढ़ की पारंपरिक लोकगाथा पंडवानी को ग्रामीण सीमाओं से निकालकर वैश्विक मंच पर प्रतिष्ठा दिलाई। कापालिक शैली को अपनाकर उन्होंने पुरुष प्रधान मानी जाने वाली इस कला में महिलाओं के लिए भी स्थान बनाया और कठिन एवं अनवरत साधना से पंडवानी में उच्चतम स्थान प्राप्त किया।

            अतिथि वक्ता डॉ. गोकुलेश्वर कुमार द्विवेदी ने कहा कि पंडवानी के क्षेत्र में तीजन बाई की पहचान अद्वितीय रही। वहीं छत्तीसगढ़ के वक्ता डॉ. देवघर महंत ने कहा कि गनियारी गांव की एक साधारण बालिका ने ऐसे मार्ग पर कदम रखा, जो फूलों का नहीं बल्कि कांटों का था। उस समय कापालिक शैली पुरुषों का क्षेत्र मानी जाती थी, लेकिन तीजन बाई ने सामाजिक रूढ़ियों को चुनौती देते हुए अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया।उन्होंने कहा कि तीजन बाई ने महाभारत को केवल गाया नहीं, बल्कि उसे जीवंत कर दिया। जब वे भीम का चरित्र प्रस्तुत करती थीं तो उनके स्वर में वज्र जैसी गर्जना सुनाई देती थी और द्रौपदी के चीरहरण के प्रसंग में करुणा की गहराई दिखाई देती थी। अर्जुन के गांडीव उठाने के प्रसंग में उनकी प्रस्तुति दर्शकों में उत्साह भर देती थी।

       डॉ. महंत ने कहा कि तीजन बाई ने सिद्ध किया कि लोककला केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि लोकचेतना का महायज्ञ है। उन्होंने कहा, “जहां न पहुंचे रवि, वहां पहुंचे कवि” की तर्ज पर यह भी कहा जा सकता है कि “जहां न पहुंचे राजसत्ता, वहां पहुंचे लोककला।”

           वक्ता डॉ. मृणालिका ओझा, नारायणी साहित्यिक संस्थान छत्तीसगढ़ ने कहा कि तीजन बाई पहली महिला कलाकार थीं, जिन्होंने कापालिक शैली में पंडवानी का प्रदर्शन कर नई पहचान बनाई। प्रसिद्ध रंगकर्मी हबीब तनवीर ने जब उनकी कला सुनी, तब उनके जीवन को नई दिशा मिली। इसके बाद उन्होंने देश-विदेश में अपनी कला का प्रदर्शन कर छत्तीसगढ़ की लोकसंस्कृति को व्यापक पहचान दिलाई।

        डॉ. विजय चौरसिया ने कहा कि डॉ. तीजन बाई ने छत्तीसगढ़ की लोकसंस्कृति को संरक्षित रखते हुए अपनी कला के माध्यम से पूरे विश्व में प्रसिद्धि हासिल की। आयोजक-संयोजक एवं छत्तीसगढ़ प्रभारी डॉ. मुक्ता कान्हा कौशिक ने कहा कि तीजन बाई विश्वविख्यात लोक गायिका थीं, जिन्होंने पंडवानी शैली के माध्यम से महाभारत की कथाओं को देश-विदेश तक पहुंचाया। उन्हें भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान सहित अनेक राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त हुए।कार्यक्रम का शुभारंभ लक्ष्मीकांत वैष्णव, माला लाभ युवा प्रभारी, द्वारा छत्तीसगढ़ी सरस्वती वंदना से किया गया। स्वागत उद्बोधन डॉ. सरस्वती वर्मा, सह प्रभारी ने दिया, जबकि आभार प्रदर्शन डॉ. अवंतिका शर्मा, राजनांदगांव ने किया।आभासी संगोष्ठी में कर्नाटक की प्रभारी डॉ. सुमा टी.आर., महाराष्ट्र के प्रभारी डॉ. भरत शेणकर, प्रयागराज की प्रभारी डॉ. पुष्पा शैली सहित देश के विभिन्न क्षेत्रों से अनेक साहित्यकार, शिक्षाविद एवं कला प्रेमी उपस्थित रहे। संगोष्ठी में वक्ताओं ने डॉ. तीजन बाई को छत्तीसगढ़ की लोककला की ऐसी महान विभूति बताया, जिनका योगदान आने वाली पीढ़ियों के लिए सदैव प्रेरणास्रोत रहेगा।

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